गीता प्रवचन – 474

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“गीता प्रवचन” ग्रन्थ से – प्रवचन-४१ (२५-११-७९) ‘भगवान् की विशेष विभूतियाँ’ बड़भागिन गीतानुयायी मण्डली ! तो स्पष्ट हुआ कि भगवान् ही सच्चाई हैं, सृष्टि कदापि-कदापि नहीं । जब यह सत्य है तो कितनी मूर्खता है तेरा मिथ्या नाम-रूपों की ओर भागना-दौड़ना अथवा उनके संकल्प- विकल्प करना । इस प्रकार यह प्रथम साधन है मन को समझाने का अथवा नाम-रूपों से हटा कर भगवान् जी की ओर लगाने किंवा जाप करते हुए एकाग्रता लाभ करने का । (२) समस्त नाम-रूप भगवान् […]

In woods of God Realization – 474

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From “In woods of God Realization” Granth – Lecture 7 (Lecture delivered at the Hermetic Brotherhood Hall, San Francisco, on December 24, 1902) My Alter Egos, My Other Selves, IN THE Books of Moses we read that God created the world. He saw his own handiwork and lo, it was beautiful and sublime. We read about it in the Book of Genesis, and so it is. You know that the attitude of mind, expressed by ―Thy Will be done, O […]

In woods of God Realization – 473

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From “In woods of God Realization” Granth – The Sacred Syllable OM (Lecture delivered at the Hermetic, Brotherhood Hall, San Francisco, on December 22, 1902) My Alter Egos, My Other Selves, Some people want to materialize thought instead of realizing all matter to be mere thought. They regard the material plane to be real as compared with the Astral world or the world of thought. According to Vedanta, the material as well as the Astral worlds are unreal. You must […]

गीता प्रवचन – 473

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“गीता प्रवचन” ग्रन्थ से – प्रवचन-४१ (२५-११-७९) ‘भगवान् की विशेष विभूतियाँ’ बड़भागिन गीतानुयायी मण्डली ! जाप करते समय मन को बार-बार यही समझाना चाहिये – ‘हे मन ! कहाँ भागता है?  जरा ध्यान से देख – (१) सब कुछ तो उस एक भगवान् से ही निकला है अथवा जितनी यह अनेकता है एकमात्र भगवान् जी से ही प्रकट हुई है । (२) जिन प्राणी-पदार्थ का तू चिन्तन कर रहा है – ये सब भगवान् जी का ही उत्पादन हैं । […]

गीता प्रवचन – 472

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“गीता प्रवचन” ग्रन्थ से – प्रवचन-४१ (२५-११-७९) ‘भगवान् की विशेष विभूतियाँ’ बड़भागिन गीतानुयायी मण्डली ! स्मरण रहे कि स्वार्थमयी क्रियाओं से अन्तःकरण पर संस्कार पड़ने के कारण अन्तःकरण मल, विक्षेप और आवरण के दोषों से दूषित हो जाता है परन्तु वही कर्म जब स्वार्थ-भावना को त्याग कर किये जाते हैं अथवा यज्ञ-बुद्धि से किये जाते है तो वे मल-विक्षेप आवरणों की धज्जियाँ उड़ा कर अन्तःकरण को शुद्ध, निर्मल एवं विमल करने में सहायक हो जाते हैं । इस प्रकार अनेक […]

In woods of God Realization – 472

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From “In woods of God Realization” Granth – The Sacred Syllable OM (Lecture delivered at the Hermetic, Brotherhood Hall, San Francisco, on December 22, 1902) My Alter Egos, My Other Selves, What makes the arms of the warrior strong? It is coming into unison with the stern, hard and fast reality of the true Self. What causes so many discoveries and inventions to be suggested to the mind? Simply the intellect or mind’s absorption for a short time in the […]