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गीता प्रवचन – 472

गीता प्रवचन” ग्रन्थ से –

प्रवचन-४१
(२५-११-७९)

‘भगवान् की विशेष विभूतियाँ

बड़भागिन गीतानुयायी मण्डली !

स्मरण रहे कि स्वार्थमयी क्रियाओं से अन्तःकरण पर संस्कार पड़ने के कारण अन्तःकरण मल, विक्षेप और आवरण के दोषों से दूषित हो जाता है परन्तु वही कर्म जब स्वार्थ-भावना को त्याग कर किये जाते हैं अथवा यज्ञ-बुद्धि से किये जाते है तो वे मल-विक्षेप आवरणों की धज्जियाँ उड़ा कर अन्तःकरण को शुद्ध, निर्मल एवं विमल करने में सहायक हो जाते हैं ।

इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ दुनिया में पाये जाते हैं, जिनका विस्तारपूर्वक वर्णन भगवान् जी कर चुके हैं ।

परन्तु-

यहाँ प्रस्तुत श्लोक में भगवान् जी कमाल कर रहे हैं यह कहते हुए कि जितने भी यज्ञ हैं उन सबमें ‘ जप-यज्ञ  मेरा ही रूप है अथवा ‘जप-यज्ञ’  में मेरी विशेष शक्ति निहित है ।

‘यज्ञानाम् जपयज्ञः अस्मि ।’

इसका स्पष्ट अर्थ यही हुआ कि जप-यज्ञ के द्वारा अन्तःकरण अन्य यज्ञों की अपेक्षा अत्यधिक शीघ्रता से शुद्ध हो जाता है । आइये, अब विचार करें भगवान् जी की इस अलौकिक विभूति पर-

‘जप’  से अभिप्राय है – भगवान् जी के किसी पावन, पवित्र एवं दिव्य नाम को लेकर उस की रटन लगाना । परन्तु ध्यान रहे-यह रटन केवल वाणी से नहीं होनी चाहिये अपितु मन को एकाग्र करते हुए ही होनी चहिये । वरन् यदि वाणी से ही जप करते रहे और मन उस में तल्लीन न हुआ या मन को उस जप से रस न मिला तब तो हमारे से ‘टेप रिकार्डर’  ही अच्छा है । क्योकि बोलने के लिए तो ‘टेपरिकार्डर’ भी बोल जाता है ।

बात तो सारी है मन को एकाग्र करने की ताकि मन उस जाप में इतना रस लेने लग जाये कि यह हमारा स्वभाव ही बन जाये। जाप ‘with feeling and with meaning’ अर्थात् भावना और अर्थ सहित ही होना चाहिये, न कि तोते की रटन की भांति । और वह सर्वोत्तम भाव यही है जिससे मन शीघ्रातिशीघ्र निर्मल हो जाता है –

‘भगवान् ही इस समस्त चराचरजगत् में एकमात्र सच्चाई है, जब कि जहान अनित्य एवं दुःखदायी है । उस एक ( भगवान्) से ही सारी सृष्टि अस्तित्व में आई है, उसी के सहारे टिकी हुई है और समय पाकर उसी में विलीन हो जायेगी ।’

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