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गीता प्रवचन – 474

गीता प्रवचन” ग्रन्थ से –

प्रवचन-४१
(२५-११-७९)

‘भगवान् की विशेष विभूतियाँ

बड़भागिन गीतानुयायी मण्डली !

तो स्पष्ट हुआ कि भगवान् ही सच्चाई हैं, सृष्टि कदापि-कदापि नहीं । जब यह सत्य है तो कितनी मूर्खता है तेरा मिथ्या नाम-रूपों की ओर भागना-दौड़ना अथवा उनके संकल्प- विकल्प करना ।

इस प्रकार यह प्रथम साधन है मन को समझाने का अथवा नाम-रूपों से हटा कर भगवान् जी की ओर लगाने किंवा जाप करते हुए एकाग्रता लाभ करने का ।

(२) समस्त नाम-रूप भगवान् जी की शक्ति के सहारे खड़े हैं अर्थात् उन्हीं की शक्ति लेकर ही अपने व्यवहार करने में समर्थ हैं । भगवान् जी की इनमें सत्ता है तब ही तो इन की इतनी महत्ता है । भगवान् की सत्ता नहीं तो इन की महत्ता कहाँ । उन्हीं की शक्ति (आत्मा) इन सबकी जान-प्राण बनी हुई है । ज़रा सोच तो भगवान् जी के इस अनमोल शिक्षा से भरपूर फ़रमान पर कि सब प्राणियो में देही (आत्मा) ही नित्य अवध्य है । इसलिए इन सब प्राणियों का शोक करना अथवा इनकी चिन्ता करना या इन के संकल्प-विकल्प करना इन्हीं के बारे में सोचते रहना तेरे लिए कदापि उचित नहीं-

देही नित्यम् अवध्य: अयम् देहे सर्वस्य भारत ।

तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वम् शोचितुम् अर्हसि ।।

– (श्रीमद्भगवद्गीता-२/३०)

 

अर्थ-

जो है सब के तन में मकीं  आत्मा

यह दायम है फ़ानी नहीं आत्मा ।

जो इस पर यकीं है तो भारत के लाल,

न कर ऐहल-ए हस्ती का रंज-ओ मलाल ।।

 

आगे चलकर १३वें अध्याय में तो हमारे गीतागायक इष्टदेव भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी महाराज ने और भी सुस्पष्ट कर दिया है यह तथ्य ! शब्दो में परिवर्तन अवश्य है परन्तु बात वही है कि जो सब प्राणियों में सम स्थित अर्थात् सदा एकरूप, एकरंग एवं एकरस रहने वाली सत्ता अविनाशी परमेश्वर को देखता है वही ठीक देखता है –

समम् सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेंश्वरम् ।

विनश्यत्सु अविनश्यन्तम् य: पश्यति स: पश्यति ।।

– (श्रीमद्भगवद्गीता-१३/२७)

-अर्थात्-

जो है कुछ नज़र तो उसी की नज़र,

नज़र में रहे जिस की परमेश्वर ।

है सब जान वालों में जानी वही,

कि फ़ानी में है गैर-फ़ानी वही ।।

संसार के नाम-रूप अपने-आप में स्वतन्त्र नहीं हैं । ये तो हैं परतन्त्र भगवान् जी के । भगवान् जी की शक्ति है तो ये चल रहे है वरन् तो इन्हें लकड़ियों की तरह जला दिया जाता है । जैसे बिजली के नाना प्रकार के उपकरणों (Points) में एक ही विद्युत्-धारा (Current) काम कर रही है । उसी के कारण से ही ये सब अपना-अपना कार्य पूरा करते हैं । इसी प्रकार नाना प्रकार की अलग-अलग शक्लों में एक ही शक्ति काम कर रही है । आत्मा है तो नाम-रूपों में चहल-पहल है, उसी के कारण से ही इनकी इतनी आन, बान, शान है । आत्मा के शरीर में प्रवेश करने से ही शरीर में हलचल उत्पन्न हो जाती है और आत्मा के निकलते ही सब प्रकार की हलचल एकदम समाप्त हो जाती है । कोई भी ऐसा रूप नहीं जिसमें भगवान् जी की शक्ति काम न कर रही हो । ज़र्रे-ज़रे में भगवान् जी की सत्ता व्याप रही है । उन्हीं के कारण से ही जगत् टिका हुआ है । अठारहवें अध्याय में उन्होंने अपने ही मुखारविन्द से इस तथ्य एवं सत्य को प्रकट किया हैं कि मैं ही सब प्राणियों के हृदय-देश में स्थित होकर अपनी माया से उनको चला रहा हूँ –

ईश्वर: सर्वभूतानाम्  ह्रद्देशे अर्जुन तिष्ठति

भामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ।।

– (श्रीमद्भगवद्गीता-१८/६१)

 

अर्थात्-

सुन अर्जुन खुदा है खुदा हर कहीं,

खुदाई के दिल में खुदा है मकीं ।

वो सब हस्तियों को घुमाता रहे,

वो माया का चक्कर चलाता रहे ।।

इसीलिए-

ऐ भोले मनुवा ! कितना महान् आश्चर्य है कि तू फिर भी उन रूपों का चिन्तन कर रहा है जिनकी अपने-आप में कोई सत्ता ही नहीं है जो भगवान् जी की सत्ता के बिना मुर्दा हैं, जो पराश्रित हैं, जो पराधीन है, जो परतन्त्र हैं । विपरीत इस के जो इन की वास्तविकता है, जिन के कारण से ये चल रहे हैं, जो सब की आत्मा बन कर सब के भीतर स्थित हैं और श्रीगीता जी में पुकार-पुकार कर कह रहे हैं –

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित: ।

– (श्रीमद्भगवद्गीता-१०/२०)

अर्थात्-

सुन अर्जुन हूँ मैं आत्मा बिलयकीं,

जो है जानदारों के दिल में मकीं ।

– उधर तेरा ध्यान तक भी नहीं ।

 

बारम्बार मन को ऐसा समझाने से और वास्तविकता की पहचान करवाने से कोई कारण नहीं कि मन जाप में एकाग्र न हो जाये ।

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