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गीता प्रवचन – 477

गीता प्रवचन” ग्रन्थ से –

प्रवचन-४१
(२५-११-७९)

‘भगवान् की विशेष विभूतियाँ

बड़भागिन गीतानुयायी मण्डली !

अन्त में उपस्थित गीता-अनुयायी जनता से ‘हृदय-सम्राट् श्रीगुरुदेव स्वामी जी’ ने अनुरोध पूर्वक कहा कि काफ़ी ज़िन्दगी तो व्यतीत हो चुकी है, अब और अधिक ज़िन्दगी इन्हीं सांसारिक व्यर्थ की कामनाओं एव धन्धों में ही न खोकर अधिक से अधिक समय अपने इष्टदेव का कोई भी महामन्त्र लेकर उस के जाप में लग जाओ । सचमुच, कलियुग में जाप से अधिक सुगम अन्तःकरण को निर्मल करने का और कोई भी साधन नहीं है । यह साधन है भी ऐसा जो प्रत्येक बड़े-बूढ़े, स्त्री-पुरुष के लिए व्यवहारिक है ।

अच्छा तो यही है कि जाप कम से कम शब्दों में हो परन्तु हो सारगर्भित, भावपूर्ण एवम् एकदम आकर्षित कर लेने वाला । जैसा कि गीताप्रेमी होने के कारण हमारे लिए उचित है कि हम गीता-गायक भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी महाराज से सम्बन्धित महामन्त्र लें और वह पावन महामन्त्र हैं – ‘हरे कृष्ण ।’  जाप करते समय इस के यही अर्थ लेने चाहियें कि मेरे ही इष्टदेव हरेक की जान-प्राण हैं और दूसरे ‘कृष्ण’ का अर्थ भी हमारे गीताचार्यों ने यही लिया हैं – जो मन को अपनी ओर आकर्षित करने की समर्थता रखता हो – ‘स: कृष्ण:’ ।

‘कर्षयति सः कृष्ण ।’

इस प्रकार जाप करते रहने से मन को जाप में रस आने लग जायेगा और कभी भी मन जाप करना छोड़ेगा नहीं, अपितु यह उस का सहज स्वभाव बन जायेगा । स्मरण रहे – कोई भी क्रिया जब बार-बार निरन्तर लम्बे समय के लिए की जाती है तो उस में एक विशेष प्रकार की शक्ति पैदा हो जाती है । इसी शक्ति के लिए भगवान् जी कह रहे हैं कि ‘जप मेरी एक विशेष अति विशेष शक्ति है, नही-नहीं यह मेरा ही रूप है ।’

‘यज्ञानाम् जपयज्ञ: अस्मि ।’

अर्थात्-

यज्ञों में जप यज्ञ निराला हूँ मैं ।

आइये, अपने क्रियात्मक जीवन द्वारा चरितार्थ कर दिखायें भगवान् जी की यह अनुपम विभूति !

परन्तु यह सम्भव कब होगा?

जब हम जाप करते-करते अपने यथार्थ स्वरूप आत्मा अथवा परमात्मा की सत्ता से अपने-आप को एक-मेक कर लेंगे ।

प्रभु आप को विशेष अति विशेष शक्ति प्रदान करें उत्साहपूर्वक जाप में लगे रहने की । उपस्थित ‘हितैषी साधु’ की इष्टदेव के श्रीचरणों में हार्दिक प्रार्थना है ।

ॐ शान्ति: ! शान्ति: !! शान्ति: !!!

जय भगवद् गीते !!!

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